नेतृत्‍व का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं NETRITVA KYA HAI

WhatsApp GroupJoin Now
New Telegram GroupJoin Now

नेतृत्‍व का अर्थ एवं परिभाषा (NETRITVA KYA HAI)

नेतृत्‍व से आशय किसी व्‍यक्ति के उन विशिष्‍ट गुणों से है, जिनके द्वारा वह अन्‍य व्‍यक्तियों का पथ प्रदर्शन कर वांछित लक्ष्‍यों की प्राप्ति करता है। अपने अनेक गुणों के कारण ही नेता दूसरों का मार्ग-दर्शन करता है। नेता अपने अच्‍छे गुणों से सभी को प्रभावित करता है। 

नेतृत्‍व की कुछ प्रमुख परिभाषाएं इस प्रकार है–

बर्नार्ड के अनुसार, ‘‘नेतृत्‍व का आशय व्‍यक्ति के व्‍यवहार के उस गुण से है, जिसके द्वारा वह अन्‍य लोगों के संगठित प्रयास से सम्‍बन्धित कार्य करने से मार्गदर्शन करता है।‘‘

अल्‍फर्ड के अनुसार, ‘‘नेतृत्‍व वह गुण है जिसके द्वारा अनुयायियों के समूह से वांछित कार्य स्‍वेच्‍छापूर्वक एवं बिना किसी दबाव के कराए जाते हैं।‘‘

लिविंगस्‍टर के शब्‍दों में, ‘‘अन्‍य लोगो में किसी सामान्‍य उद्देश्‍य का अनुसरण करने की इच्‍छा को जागृत करने की योग्‍यता ही नेतृत्‍व है।‘‘

कूण्‍टज एवं ओडोनेल के अनुसार, ‘‘किसी उद्देश्‍य की प्राप्ति हेतु सम्‍प्रेषण के माध्‍यम द्वारा व्‍यक्तियों को प्रभावित करने की योग्‍यता ही नेतृत्‍व है।‘‘

ऊपर दियें गयी परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है। कि नेतृत्‍व एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक व्‍यक्ति अन्‍य व्‍यक्तियों या समूह के कार्य का संचालन, संगठन व नियंत्रण करता है ताकि वांछित लक्ष्‍यों की प्राप्ति हो सके। 

नेतृत्‍व की विशेषाताएं (NETRITVA KI VISHESHTA)

नेतृत्‍व की विभिन्‍न विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाओं का अध्‍ययन करने के पश्‍चात् यह कहा जा सकता है कि नेतृत्‍व की कुछ प्रमुख विशेषतायें निम्‍नलिखित हैं–

1. अनुयायी

नेतृत्‍व की प्रमुख विशेषता है नेता के कुछ न कुछ अनुयायियों का होना। अन्‍य शब्‍दों में, अनुयायियों के बिना कोई नेता नहीं हो सकता। इसलिये यह ठीक ही कहा गया है कि अनुयायियों के अभाव में नेता एवं उसके नेतृत्‍व की कल्‍पना तक नहीं की जा सकती। नेतृत्‍व की यह विशेषता निम्‍न दो बातों पर बल देती है–

1. नेता को अपने अनुयायियों से स्‍वाभाविक आज्ञापालन प्राप्‍त होना चाहिये। 

2. नेता का नेतृत्‍व अनुयायियों को स्‍वीकार होना चाहिये। 

2. क्रियाशील सम्‍बन्‍ध

नेता और उसके अनुयायियों के मध्‍य पारस्‍परिक सम्‍बन्‍ध निष्क्रिय न होकर कुछ निश्चित क्रियाओं का आधार होते हैं। अन्‍य शब्‍दों में, नेता और अनुयायियों के पारस्‍परिक सम्‍बन्‍ध निष्क्रिय न होकर क्रियाशील होते हैं। नेता अपने अनुयायियों को कार्य करने के लिये दिशा प्रदान करता है और उन्‍हें इसका अनुसरण करने के लिये प्रेरित करता है। नेता स्‍वयं भी अपने अनुयायियों के साथ क्रियायें करता है और उनका सहयोग प्राप्‍त करता है। 

3. सामान्‍य लक्ष्‍य 

नेतृत्‍व की यह प्रकृति है कि नेता संस्‍था के सामान्‍य लक्ष्‍यों की प्राप्ति हेतु अपने अनुयायियों को निर्देशित करता है। नेता अपने अनुयायियों को निर्धारित लक्ष्‍यों की जानकारी देता है। उन्‍हें लक्ष्‍यों को स्‍पष्‍ट परिभाषित कराता है, और उनकी लक्ष्‍यों की प्राप्ति में आने वाली बाधाओं को दूर करने का प्रयास करता है।

4. आर्दश आचरण

नेता अपने आचरण से ही अनुयायियों को प्रभावित करता है। अतः उसे अपने आचरण द्वारा अनुयायियों के समक्ष एक उच्‍च-कोटि का आदर्श प्रस्‍तुत करना चाहियें। एक नेता जो स्‍वयं कार्य पर देर से आता हो अपने अनुयायियों से ठीक समय पर आने की आशा नहीं कर सकता। नेता की कथनी और करनी में अन्‍तर नहीं होना चाहिए। उसे अपना आचरण एक आदर्श के रूप में प्रस्‍तुत करना चाहियें जिसे अधीनस्‍थ अनुसरण कर अपनी और संस्‍था, दोनो  की प्रगति कर सकें। 

5. हितों की एकता 

नेता और उसके अनुयायियों के मध्‍य हितों की एकता होना चाहिये। किसी संगठन में नेतृत्‍व का कोई प्रभाव नहीं रहता यदि नेता और उसके अनुयायी अलग-अलग उद्देश्‍यों के लिये प्रयास करें। किसी संगठन में प्रभावी नेतृत्‍व उसी समय कहा जा सकता है जबकि नेता और अनुयायी एक ही उद्देश्‍य की पूर्ति के लिये कार्य करें। इस सम्‍बन्‍ध में जॉर्ज आर.टैरी ने ठीक ही कहा है कि, नेतृत्‍व पारस्‍परिक उद्देश्‍यों की पूर्ति हेतु व्‍यक्तियों को स्‍वैच्छिक प्रयत्‍न करने के लिये प्रभावित करने की क्रिया है। यहॉ यह उल्‍लेखनीय है कि नेता और उसके अनुयायी या अनुयायियों में आपस में पूर्णतया हितों की एकता की आशा करना ठीक नहीं। लेकिन नेता को आपसी मतभेदों को दूर कर संगठन के लक्ष्‍यों और कर्मचारियों के लक्ष्‍यों में एकता स्‍थापित करने का प्रयास करना चाहियें। उसे अनुयायियों को स्‍पष्‍ट कर देना चाहियें कि संस्‍था के हितों की रक्षा करना ही सभी के हितों की रक्षा करना है। 

6. नेतृत्‍व एक गतिशील प्रक्रिया है

प्रत्‍येक संगठन में नेतृत्‍व की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। व्‍यावसायिक प्रतिष्‍ठान की स्‍थापना से लेकर जब त‍क प्रतिष्‍ठान विद्यमान रहता है तब तक नेतृत्‍व की क्रिया विद्यमान रहती है। प्रबन्‍धक आये दिन नवीन तकनीकों को अपनाते रहते हैं और इनके सम्‍बन्‍ध में कर्मचारियों को आवश्‍यक सूचना, प्रशिक्षण, निर्देशन देते रहते हैं। इस प्रकार नेतृत्‍व की क्रिया बौद्धिक है जो सदैव चलती रहती है। 

Back to top
You cannot copy content of this page