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लोक प्रशासन का अर्थ, परिभाषा, महत्व / Lok Prashasan Arth Paribhasha Mahatva

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लोक प्रशासन किसे कहते हैं क्या है तात्‍पर्य, मतलब, आशय, लोक प्रशासन का अर्थ, लोक प्रशासन की परिभाषा, लोक प्रशासन का महत्व बताइए।

Lok Prashasan / लोक प्रशासन 

आधुनिक युग समाजवाजी और लोक कल्याणकारी राज्य का युग है। इस युग मे शासन जनता की भलाई के लिए कई कार्यक्रमो को अपने हाथ मे लेता हैं। मानव जीवन की अनन्त इच्छायें है जिनकी पूर्ती के लिए वह हमेशा क्रियाशील रहता है इसके मानव को अनेक सुविधाओं की भी आवश्यकता होती हैं। प्राचीनकाल मे शासन की रचना सरल हुआ करती थी क्योंकि उस समय शासन के पास काम भी बहुत कम ही हुआ करते थे। अत: वर्तमान मे राज्य के कार्य क्षेत्र मे वृध्दि का लोक प्रशासन के क्षेत्र पर प्रभाव पड़ रहा हैं।

लोक प्रशासन का अर्थ (lok prashasan kya hai) 

लोक प्रशासन दो शब्दों से मिलकर बना है पहला “लोक” और दूसरा “प्रशासन”। प्रशासन कार्यों के प्रबंध अथवा उनको पूरा करने की एक क्रिया है। किसी क्षेत्र में विशिष्ट शासन या किन्ही मानव प्रबंधन गतिविधियों को प्रशासन (administration) कहा जा सकता है। जब यह सार्वजनिक हित के लिये किया जाता है तो इसे लोक प्रशासन कहा जाता है। लोक प्रशासन जनता के हित के लिए सरकार द्वारा किया गया संगठित कार्य हैं।
लोक प्रशासन राजनीति की एक व्यवहारिक शाखा है। इसमे राज्य के प्रशासनिक या शासन के उस भाग का जो नीतियों के क्रियान्वयन से किसी प्रकार से जुड़े हुए हैं, ढांचा और उनकी कार्य प्रणाली संगठन इत्यादि का गहन अध्ययन किया जाता हैं।

लोक प्रशासन की परिभाषा (lok prashasan ki paribhasha)

लूथर गुलिक के अनुसार लोक प्रशासन की परिभाषा, “लोक प्रशासन, प्रशासन का वह भाग है, जिसका सम्बन्ध सरकार से है। वह मुख्य रूप से उसकी कार्यपालिका की शाखा से सम्बध्द है, वहाँ सरकार का कार्य किया जाता हैं।”
ई.एन. ग्लैडन के अनुसार, “लोक प्रशासन मे लोक पदाधिकारी के समस्त कार्य सम्मिलित है जिनका सम्बन्ध प्रशासन से है, चाहे वह व्यक्तिगत प्रशासन हो अथवा क्लर्क का कार्य हो।”
डाॅ. डी. व्हाइट के शब्दों मे,” लोक प्रशासन का उद्देश्य ऐसी नीतियों को कार्यान्वित करना है जिनसे सार्वजनिक हित संभव हो सके।”
बुडरो विल्सन के अनुसार,” लोक प्रशासन विधि अथवा कानून को विस्तृत एवं क्रमबद्ध रूप से कार्यान्वित करने का नाम है। विधि को कार्यान्वित करने की प्रत्येक क्रिया एक प्रशासकीय क्रिया है।”
पर्सी क्वीन के अनुसार,” लोक प्रशासन वह प्रशासन है जिसका संबंध सरकार द्वारा किये गये कार्य से है चाहे वह कार्य केन्द्रीय हो या स्थानीय हो।”

दुडरो विल्सन के अनुसार,” लोक प्रशासन विधि की विस्तृत तथा व्यवस्थित प्रयुक्ति हैं। विधि की प्रत्येक विशेष प्रयुक्ति प्रशासन का कार्य हैं।” 

मर्सन के अनुसार,” प्रशासन कार्य करवाता है और जिस प्रकार राजनीति विज्ञान सर्वोत्तम साधनों की जिज्ञासा हैं, ताकि नीति-निर्माण के लिए जनता की इच्छा को संगठित किया जा सके, उसी प्रकार लोक-प्रशासन का विज्ञान जिज्ञासा हैं कि किस प्रकार नीतियों को सर्वोत्तम कार्यान्वित किया जा सके।” 

मार्शल ई. डिमाॅक के अनुसार,” साधारण प्रयोग से लोक-प्रशासन का अर्थ राष्ट्रीय, राज्य तथा स्थानीय सरकारों की कार्यकारिणी शाखाओं की क्रियाएँ हैं।” 

डाॅ. एन. के श्रीवास्तव के अनुसार,” लोक प्रशासन वह प्रशासन है जिसमे जनता के कार्यों के प्रबन्धों के लिए शासन एक प्रशासकीय ढांचा या मशीनरी संगठित करता है।

व्यक्तियों के यत्नों में ताल-मेल उत्पन्न करके सरकार का कार्य करवाना ही लोक-प्रशासन हैं, ताकि पूर्व निर्धारित कार्यों को पूरा करने के लिए वे मिल कर काम कर सकें। प्रशासन में वे क्रियाएँ आती है जो अत्यधिक तकनीकी अथवा विशिष्ट हो सकती हैं, जैसे– लोक-स्वास्थ्य और पूल-निर्माण। इसमें हजारों ही नहीं, अपितु लाखों श्रमिकों की क्रियाओं की निगरानी, निर्देशन तथा प्रबंध भी सम्मिलित होता हैं, ताकि उनके प्रयत्नों से कुछ व्यवस्था और कुशलता उत्पन्न हो।

लोक प्रशासन का महत्व (lok prashasan ka mahtva)

लोक प्रशासन आधुनिक राज्य का दर्पण है। यह मानव जीवन के बहुमुखी विकास की दिशा व दशा दोनों मे ही लोक प्रशासन का अमूल्य योगदान है। लोक प्रशासन का उद्देश्य जनहित है अधिक से अधिक जनता का हित हो इसके लिए प्रशासन मे सुधार और नए वैज्ञानिक आविष्कारों की भी आवश्यकता है। शासन के विशाल संगठनात्मक ढांचे मे लोक प्रशासन का वही महत्व है जो हमारे घर मे बैठक का होता है। 

प्रोफेसर डोन्हम के अनुसार, “यदि हमारी सभ्यता का विनाश, होता है या असफल रहती है तो उसका मुख्य कारण प्रशासन की असफलता होगी।” 

लोक प्रशासन पर किसी शासन की सफलता और विफलता निर्भर करती है। लोक प्रशासन मे सरकार की संरचना व कार्यों के बारे मे एक सही, व्यवस्थित और वैज्ञानिक ज्ञान निर्मित करने की क्षमता होती है।
लोक प्रशासन का महत्व सिर्फ इसलिए ही नही है कि यह एक लोक कल्याणकारी राज्य की सफलता का मुख्य आधार है, बल्कि लोक प्रशासन का महत्व उसकी सर्वव्यापकता तथा सर्वमौलिकता के कारण भी हैं। लोक समस्याओं के समाधान हेतु विश्वसनीय सिद्धान्तों और तकनीकों का विकास लोक प्रशासन द्वारा होता है। लोक प्रशासन सभ्य समाज की पहली आवश्यकता है। लोक प्रशासन कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने, विद्यार्थियों को कार्यरत एवं प्रशासनिक दृष्टिकोण के प्रति गतिशील करने व प्रशासको को पेशेवर योग्यता के साथ व्यावसायिक धारा मे सम्मिलित होने के योग्य बनाने मे बहुत ही उपयोगी रहा है। लोक कल्याणकारी राज्य एक ऐसा समाज है जिसमे जीवन का न्यूनतम स्तर प्राप्त करने का यकीन तथा मौका प्रत्येक व्यक्ति को मिलता है। लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना का भार लोक प्रशासन का हैं।

लोक प्रशासन के महत्व को निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा समझा जा सकता हैं‌–

1. राज्य का व्यवहारिक व विशिष्ट भाग

शासन अर्थात् सरकार के कार्यों तथा दायित्वों को मूर्तरूप प्रदान करने में लोक प्रशासन की एक अनिवार्य तथा विशिष्ट आवश्यकता है। क्योंकि आधुनिक युग में राज्य को एक बुराई के रूप में नहीं बल्कि मानव कल्याण तथा विकास के लिए एक अनिवार्यता रूप में देखा जाता है। 

2. जन कल्याण का माध्यम

वर्तमान समाजों की अधिसंख्य मानवीय आवश्यकताएँ राज्य के अभिकर्ता अर्थात् लोक प्रशासन द्वारा पूरी की जाती है। चिकित्सा स्वास्थ्य, परिवार कल्याण, शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, जन संचार, परिवहन, ऊर्जा, सामाजिक सुरक्षा, कृषि उद्योग, कुटीर उद्योग, पशुपालन, सिंचाई डाक तथा आवास इत्यादि समस्त मूलभूत मानवीय सामाजिक सेवाओं का संचालन प्रशासन के माध्यम से ही संभव है। 

3. रक्षा, अखण्डता तथा शांति व्यवस्था के लिए

कुशल प्रशासन, सरकार का एकमात्र सशक्त सहारा है। इसकी अनुपस्थिति में राज्य क्षत-विक्षत हो जाएगा। न्याय, पुलिस, सशस्त्र बल हथियार निर्माण, अन्तरिक्ष, परमाणु ऊर्जा, बहुमूल्य खनिज, वैदेशिक सम्बन्ध तथा गुप्तचर इत्यादि गतिविधियों ऐसी हैं जो किसी भी राष्ट्र की बाहरी एवं भीतरी सुरक्षा को स्पष्ट तथा प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। ऐसी गतिविधियाँ या विषय जानबूझकर लोक प्रशासन के अधीन रखे जाते हैं। 

4. लोकतंत्र का वाहक एवं रक्षक

आम व्यक्ति तक शासकीय कार्यों की सूचना पहुँचाना नागरिक तथा मानव अधिकारों को क्रियान्विति करना, निष्पक्ष चुनाव करवाना, जन शिकायतों का निस्तारण करना, राजनीतिक चेतना में वृद्धि करना तथा विकास कार्यों में जन सहभागिता सुनिश्चित कराने के क्रम में लोक प्रशासन की भूमिका सर्वविदित है। 

5. सामाजिक परिवर्तन का माध्यम

आधुनिक समाजों विशेषतः विकासशील समाजों की परम्परागत जीवन शैली, अंधविश्वास, रूढ़ियों तथा कुरीतियों में सुनियोजित परिवर्तन लाना एक सामाजिक आवश्यकता है। सुनियोजित सामाजिक परिवर्तन के लिए शिक्षा राजनीतिक चेतना, आर्थिक विकास, संविधान, कानून, मीडिया, दबाव समूह तथा स्वयंसेवी संगठनो सहित प्रशासन भी एक यंत्र माना जाता है। 

6. सभ्यता, संस्कृति तथा कला का संरक्षक

यद्यपि आदिकाल से ही कला एवं संस्कृति को राजाओं का संरक्षण मिलता रहा है तथापि वर्तमान भौतिक युग में जहाँ सांस्कृतिक परिवर्तन की दर अत्यधिक है, राज्य के दायित्व पूर्व की तुलना में कहीं अधिक एवं गम्भीर हो गए हैं। सांस्कृतिक अतिक्रमण, आक्रमण तथा पतन की ओर अग्रसर गौरवशाली मूल्यों के संरक्षण में निस्संदेह लोक प्रशासन ही सशक्त भूमिका निर्वाहित कर सकता है।

7. विकास प्रशासन का पर्याय

समाजवादी शासन व्यवस्थाओं में सम्पूर्ण विकास प्रशासन के प्रयासों पर निर्भर करता है, वही पूँजीवादी देशों में भी विकास की मूलभूत नीतियाँ, लोक प्रशासन ही तैयार करता है। विकास के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए लोक प्रशासन के कार्मिकों तथा विशेषज्ञों द्वारा अनेक प्रकार की लोक नीतियाँ निर्मित तथा क्रियान्वित की जाती हैं। 

8. विधि एवं न्याय

आधुनिक राज्यों में मुख्यतः विधि का शासन प्रवर्तित है, अर्थात् कानून सर्वोपरि है। कानून या विधि से बढ़कर कोई नहीं है। लोक प्रशासन का यह कर्तव्य है कि वह संविधान, कानूनों, नियमों नीतियों तथा निर्धारित मापदण्डों के अनुसार भेद-भावरहित ढंग से समस्त राजकीय क्रियाएँ संचालित करवाये। 

9. औद्योगिक एवं आर्थिक विकास

किसी भी राष्ट्र के सम्मुख प्रमुख चुनौती वित्तीय संसाधनों में वृद्धि तथा जनकल्याण की ही होती है। राष्ट्र के समस्त प्रकार के संसाधनों के सदुपयोग को सुनिश्चित करने व्यापार संतुलन को बनाए रखने, राष्ट्रीय आय में वृद्धि करने जीवन स्तर को उच्च बनाने विश्व के साथ प्रतिस्पर्धा करने वाणिज्यिक एवं व्यापारिक गतिविधियाँ नियंत्रित करने तथा विधि ग्राहय् मुद्रा संचालन के क्रम में लोक प्रशासन की उपादेयता स्वयंसिद्ध है। 10. आजीविका का माध्यम

राज्य सर्वश्रेष्ठ नियोक्ता है तथा लोक प्रशासन केवल जनकल्याण तथा विकास के कार्यक्रम ही संचालित नहीं करता है। बल्कि विशाल जनसंख्या को रोजगार उपलब्ध कराने का भी श्रेष्ठ स्थल है। लोक प्रशासन में कार्य करने वाले लोक सेवकों की प्रत्येक युग में सदैव ही एक विशिष्ट छवि रही है।

निष्कर्ष 

उपरोक्त विवेचन से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि लोक प्रशासन राजनीति की एक व्यवहारिक शाखा हैं। इसमें राज्य के प्रशासनिक या शासन के उस भाग का जो नीतियों के क्रियान्वयन से किसी न किसी प्रकार से जुड़े हुए हैं, का ढाँचा और उनकी कार्य प्रणाली, संगठन इत्यादि का गहन अध्ययन किया जाता है। यह कार्य कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका के स्थानीय प्रान्तीय और राष्ट्रीय स्तर पर कहीं भी हो सकता हैं। आज के युग में इसका अध्ययन अनेकों कारणों से अत्यन्त महत्वपूर्ण हो गया हैं।

लोक प्रशासन की मुख्य समस्याएं 

लोक प्रशासन की अनेक समस्याएं हैं, उनमें से मुख्य समस्याएं निम्नलिखित हैं– 

1. भौतिक साधनों की समस्या

लोक प्रशासन की सफलता का आधार उसके द्वारा प्रयोग होने वाले भौतिक साधनों एवं उसके द्वारा जुटायी गई सामग्री हैं। इन साधनों के बिना लोक प्रशासन का कार्य सुचारू रूप से नहीं चल सकता। इन साधनों को जरूरत के अनुसार वाँछित मात्रा में जुटाना लोक प्रशासन की एक प्रमुख समस्या हैं। 

2. धन संग्रह की समस्या

जिस तरह धन मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति का साधक हैं, उसी प्रकार लोक प्रशासन की सारी आवश्यकताएँ भी धन से पूरी होती हैं। कर्मचारियों की नियुक्ति, उनका वेतन, विभाग-निर्माण, साधनों एवं सामग्री का जुटाना आदि सभी जरूरतों की पूर्ति धन के बिना संभव नहीं हैं। 

3. प्रशासनिक समस्या 

प्रशासनिक कार्यों से सुसम्पादन के लिए योग्य तथा अनुभवी प्रशासक की जरूरत होती हैं। यदि प्रशासक में योग्यता, अनुभव, गम्भीरता, शीघ्र, व उचित निर्णय लेने की क्षमता नहीं है तो उसकी सूक्ष्म-सी उत्तेजना से प्रशासन असफल हो जाता हैं। इसलिए योग्‍य व अनुभवी प्रशासकों की नियुक्ति करना, लोक प्रशासन की सबसे पहली और प्रमुख समस्या हैं। इसके अलावा प्रशासनिक सत्ता का सुनिश्चित होना भी जरूरी होता हैं। 

4. संगठनात्मक समस्या

लोक प्रशासन की चौथी समस्या प्रशासनिक संगठन, उसके आधार तथा बनावट से संबंधित है। इसमें विभागों का निर्माण, उनमें कार्य-विभाजन और उनके पारस्परिक संबंधों से संबंधित समस्याओं के समाधान की समस्या आती हैं। इस तरह वह समस्या प्रशासनिक संगठन की हैं। 

5. कर्मचारी समस्या

कर्मचारियों तथा पदाधिकारियों की नियुक्ति, पदोन्नति, वेतन-वृद्धि, सेवा शर्तों तथा उनके प्रशिक्षण आदि की उचित व्यवस्था से संबंधित समस्याएँ भी लोक प्रशासन की महत्वपूर्ण समस्याएँ हैं।

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